लुटियन्स में बैठे हमारे प्रधान सेवक को
फ़िक्र है देश में बढ़ती 'ओबेसिटी' की।
वहीं, खान मार्केट से लेकर
पूरी दिल्ली में फैले बड़े-बड़े कवियों को
फ़िक्र है — ग़ज़ा की।
फ़िक्र है देश में बढ़ती 'ओबेसिटी' की।
वहीं, खान मार्केट से लेकर
पूरी दिल्ली में फैले बड़े-बड़े कवियों को
फ़िक्र है — ग़ज़ा की।
विदर्भ के किसान,
भुखमरी में मरे सुदूर इलाक़ों के लोग,
या ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हमारी रैंक —
सब महज़ एक विदेशी प्रोपेगेंडा हैं,
ऐसा बताया गया है।
आप इन सब में
कोई क्रोनोलॉजी मत खोजिए।
देश के मीडियाई कबूतरों — यह सरकार की आलोचना नहीं है
और सनद रहे,
यह कोई कविता भी नहीं है।
© मनीष के.
No comments:
Post a Comment