4.12.25

गिलास

 वे अलग-अलग शक्ल और कद-काठी के होते हैं —
कभी उनकी पेंदी में हल्की-सी नेल पॉलिश का टीका,
जैसे किसी ने उन पर नज़र उतारी हो।
कभी शीशे के — दिल जैसे,
एकदम पारदर्शी और शुद्ध काँच के।

और कभी-कभी, कहीं-कहीं,
बेपैरहन — फाइबर की शक्ल में।

पड़े रहते हैं हमारे घर के उस हिस्से में,
जो लगभग अछूता होता है।

जब खान चा या उस टोले का कोई आ जाए,
तो बस, इनकी बल्ले-बल्ले।
तुरंत पूछा जाता है —
“अरे, वो वाला गिलास निकालो।”

झट नहला-धुला कर,
रेडिमेड  होके
सामने आ खड़े होते हैं —
और जाते ही, फिर अपनी पुरानी जगह पर।

कभी दो टोलों की दूरी घटा देते हैं,
कभी और बढ़ा देते हैं।

वे खुद नहीं जानते —
किसने उन्हें ‘छूने लायक’ बनाया,
और किसे उनसे दूर रहना सिखाया।

पर हमने उन्हें
पीढ़ी दर पीढ़ी संभाले रखा है —
और न जाने कितनी पीढ़ियों तक
ऐसे ही संभाले रखेंगे।

सनद रहे —
यह कोई जातिवादी कविता नहीं है।
© मनीष के.

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