10.12.25

वह एक दिन

वह एक दिन

जब मन करे अपने नाखूनों से

अपना ही चेहरा नोच लेने का।

जब मन करे किसी से

या अपनी ही ज़िंदगी से बेवफ़ा हो जाने का।

वह एक दिन

जो बीत ही नहीं रहा हो।


वह एक दिन

जब समुंदर में डूब जाने का मन हो।

वह एक दिन

जब आग से खेल जाने का मन हो।


वह एक दिन

जिसमें सदियाँ घटने लगती हैं।

जिस दिन छूट गई हो नौकरी,

या कोई ज़रूरी परीक्षा।

वह एक दिन

जिस दिन कोई अपना छोड़ जाए।


वह एक दिन

जब मासिक धर्म से दुखती कमर को

पूरे दिन धूप में जलना हो।

वह एक दिन

जिस दिन लगने लगे

कि जिया जाए तो किसके लिए।


वह एक दिन

जब रोने से भी दिल हल्का न हो।

वह एक दिन

जब पैसों की किल्लत

ज़िंदगी की जिल्लत से भी बदतर लगे।


वह एक दिन

जब पानी भी भूख न मिटा पाए।


वह एक दिन

जो तमाम कोशिशों के बावजूद

न बीत रहा हो।

वह एक दिन

जो किसी के लिए

एक साल, दो साल

या दस साल का हो सकता है।


वह एक दिन

जिसमें साँसें घुट रही हों।

बस इंतज़ार करना

घुटती साँसों

और बंद होते दिल के साथ

उस दिन के बीत जाने का।


© मनीष के.


No comments:

Post a Comment