19.5.26

Happily Married Ever After

 गार्ड ने इंटरकॉम पर पूछा, “मैम, डिलीवरी है। भेज दूँ?”

संध्या ने मोबाइल पर आए नोटिफिकेशन को देखा और अप्रूव कर दिया। फिर उसी मोबाइल पर अपनी इंस्टा स्टोरी देखने लगी। स्टोरी में उसके घर के दरवाज़े की तस्वीर थी, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था, “Home Sweet Home.”

वह दिल्ली की एक चमचमाती, पॉश सोसाइटी का 3BHK प्लस फ्लैट था। कीमत करोड़ों में। लग्जरी ऐसी कि गार्ड आपके आने से पहले अप्रूवल भेजते थे, कैमरे आपको तब तक देखते रहते थे, जब तक आप उस फ्लैट तक न पहुँच जाएँ जहाँ आपको जाना है। डिलीवरी वालों के लिए अलग लिफ्ट थी, सर्विस वालों के लिए अलग, और फ्लैट में रहने वालों के लिए अलग।

यह फ्लैट संध्या के पापा ने अच्छी-खासी बेस पेमेंट करके खरीदा था। तय हुआ था कि शादी के बाद EMI दोनों बच्चे मिलकर भर लेंगे। अभी भी हर महीने लाख के करीब EMI जाती थी।

सूरज छत्तीसगढ़ से था और संध्या लखनऊ से। दोनों पढ़ने-लिखने में शुरू से ब्रिलियंट माइंड टाइप रहे थे। सूरज वह लड़का था जिसके मैथ्स में सौ में सौ आते थे। संध्या वह लड़की थी जो मैथ्स भी कर लेती थी और मौका मिले तो मंच पर थिरक भी लेती थी।

कॉलेज में वह कल्चरल प्रोग्राम्स में भाग लेती थी। कभी-कभी लिखती थी। आर्ट बनाती थी। किताबें पढ़ती थी। अब भी किताबें पढ़ना चाहती थी, लेकिन जिस कंपनी में वह टीम लीड थी, वहाँ कभी-कभी वीकेंड भी कंपनी का हो जाता था।

सूरज सिर्फ पढ़ीस टाइप का स्टूडेंट था। सीधा, तेज, मेहनती और लक्ष्य पर टिके रहने वाला। उसने कभी गाने नहीं गाए, कभी बेवजह कविताएँ नहीं पढ़ीं, कभी किसी बात को जरूरत से ज्यादा महसूस नहीं किया। वह उन लोगों में से था जो जीवन को ठीक-ठीक जीते हैं, ज्यादा बहते नहीं।

पढ़ाई खत्म होते ही दोनों को दिल्ली-एनसीआर में नौकरी मिल गई। लाखों के पैकेज वाली। दोनों मध्यवर्गीय परिवारों से थे, लेकिन थोड़ा अलग तरह के मध्यवर्ग से। सूरज के माता-पिता सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उसे कभी बहुत अधिक आर्थिक तंगी का अहसास नहीं हुआ। संध्या के पिताजी प्रदेश की राजनीति में थे, रुतबे वाले आदमी। जब दोनों ने IIT फोड़ा, तो दोनों परिवारों ने अपने-अपने मोहल्लों में महीनों तक सीना तानकर चलना जारी रखा।

खैर, मध्यवर्गीय परिवारों में आदमी के जीवन के कुल चार ही चरण माने जाते हैं: जन्म, इंजीनियरिंग या डॉक्टरी, शादी-बच्चे और मौत। इसके इतर सब बकवास है। UPSC हो जाए तो बात अलग है।

संध्या के घरवालों ने उसके लिए रिश्ता खोजना शुरू किया। उसने कई रिश्तों को मना किया, तो एक दिन घरवालों ने वही पुराना जाल फेंका, “कोई हो तो बता दो?”

कोई था नहीं। मतलब, संध्या कभी किसी प्रॉपर रिलेशनशिप में नहीं रही थी। लेकिन एक लड़का था, संयम। किसी दोस्त का दोस्त। ठीक-ठाक नौकरी। आर्ट और सिंगिंग का शौकीन। वह बेसुरा नहीं था, पर बहुत अच्छा गायक भी नहीं था। बस जब गाता था तो लगता था कि गाना किसी सुर से ज्यादा किसी भरोसे पर टिका है।


संयम को संध्या पसंद थी। संध्या की लखनवी तहजीब, उसका लहजा, उसकी बेवजह लंबी बातें। संध्या भी उसे पसंद करती थी। वह उससे मिलती तो ऑफिस, घर, किताब, सड़क, मौसम, ऑटो वाले की बदतमीज़ी, किसी पुरानी कविता, किसी नए कैफ़े, सब पर बोलती चली जाती। संयम सुनता रहता। बीच-बीच में बस इतना कहता, “तुम बोलती नहीं हो, बहती हो।”

संध्या हँस देती।

एक दिन संध्या ने उससे कहा, “अपना बायोडाटा दो। दीदी को भेजती हूँ। वह पापा से बात करके ट्राई करेंगी।”

संयम ने बायोडाटा भेज दिया। उसमें डिग्री थी, नौकरी थी, सैलरी थी, शौक थे। बस खानदान उतना भारी नहीं था, जितना संध्या के घरवालों को चाहिए था।

बायोडाटा संध्या के पापा तक पहुँचा। उन्होंने देखा और कहा, “मास्टरों के घर के मिडिल क्लास लड़के के साथ तुम सर्वाइव नहीं कर पाओगी। और यह बात यहीं खत्म कर दो।”

संध्या ने बहुत बहस नहीं की। शायद वह थक गई थी। शायद वह उन लड़कियों में से थी, जो पिता की बातें ज्यादा काटती नहीं हैं। शायद उसने सोचा होगा कि घरवालों को ज्यादा पता होगा। शायद उसने यह भी सोचा होगा कि पसंद और जीवन दो अलग चीज़ें हैं।

जब संयम को यह बात पता चली, तो उसका प्रयास भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। वह ज्यादा पैसे कमाने का वादा कर सकता था। मेहनत करने का वादा कर सकता था। संध्या को खुश रखने का भी वादा कर सकता था। पर अपना खानदान रातोंरात नहीं बदल सकता था।

फिर सूरज का रिश्ता आया। किसी कॉमन रिश्तेदार के यहाँ से। लड़का IIT वाला। नौकरी अच्छी। परिवार ठीक। आदतें साफ। भविष्य सुरक्षित। संध्या के पापा को रिश्ता पसंद आया।

कोर्टशिप पीरियड में संध्या और सूरज मिले भी। कैफ़े में। मॉल में। कभी-कभी फोन पर। बातें हुईं, नौकरी, शहर, घर, लोन, फर्नीचर, शादी की डेट, गेस्ट लिस्ट, हनीमून पैकेज। सब जरूरी बातें। कोई फिजूल बात नहीं।


शादी हो गई।


कई साल हो गए उन्हें उस महंगी सोसाइटी में रहते हुए। घर में सब कुछ था। जर्मन कार से लेकर जर्मन शेफर्ड तक। मॉड्यूलर किचन था। दो बालकनियाँ थीं। एक स्टडी थी। दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स थीं। दरवाज़े पर “Home Sweet Home” लिखा था। इंस्टा बायो में “Happily Married Ever After” भी।

सूरज जिम्मेदार पति था। बिल समय पर भरता था। EMI कभी लेट नहीं होती थी। संध्या बीमार पड़ती तो डॉक्टर की अपॉइंटमेंट बुक कर देता। उसकी फ्लाइट हो तो कैब लगा देता। घर में कुछ खराब हो जाए तो सर्विस रिक्वेस्ट डाल देता। वह सब करता था जो एक पति को करना चाहिए।

बस वह नहीं करता था जो प्रेम कभी-कभी बिना किसी चेकलिस्ट के कर देता है।

दुख के भयंकर पलों में वे एक-दूसरे को गले नहीं लगाते थे। सुख के अथाह क्षणों में भी एक-दूसरे को बेतहाशा चूमते नहीं थे। सूरज ने टूटी हुई आवाज़ में संध्या को कभी कोई गाना नहीं सुनाया। संध्या भी यूँ ही, बिना बात, उसके सामने कभी नहीं थिरकी।

कभी-कभी उसे संयम याद आता था। कोई बड़ा प्रेम नहीं। कोई महान प्रेमकथा नहीं। बस वह लड़का, जिसके सामने वह ढेर सारी फिजूल बातें कर सकती थी। जिसके साथ चलते हुए उसे लगता था कि वह चल नहीं रही, थिरक रही है।

एक रविवार संध्या ने अलमारी साफ करते हुए पुरानी डायरी निकाली। उसमें एक पन्ने पर उसने कभी लिखा था, “कुछ लोग जीवन में घर नहीं देते, पर भीतर जगह बना देते हैं। जहाँ बहुत कुछ न होते हुए भी लगता है कि सब कुछ है।”

वह देर तक उस लाइन को देखती रही।

सूरज ने कमरे में आते हुए पूछा, “लंच में क्या ऑर्डर करें?”

संध्या ने कहा, “कुछ भी।”

“थाई?”

“ठीक है।”

सूरज ने ऐप खोल लिया। संध्या ने खिड़की से बाहर देखा। नीचे डिलीवरी बॉय अपनी अलग लिफ्ट की तरफ जा रहा था। सर्विस स्टाफ अपनी अलग लिफ्ट की तरफ। रेज़िडेंट्स अपनी अलग लिफ्ट से ऊपर जा रहे थे।


उसे अचानक लगा कि इस घर में भावनाओं की भी अलग-अलग लिफ्टें हैं।

दुख अपनी लिफ्ट से आता है। सुविधा अपनी लिफ्ट से। जिम्मेदारी अपनी लिफ्ट से। और प्रेम शायद नीचे गेट पर ही खड़ा रह जाता है, अप्रूवल का इंतज़ार करता हुआ।

उसने मोबाइल उठाया। इंस्टा पर अपनी ही पुरानी स्टोरी खुली थी, “Home Sweet Home.”

संध्या ने स्क्रीन बंद कर दी।

घर में तीन बेडरूम थे, एक स्टडी थी, दो बालकनियाँ थीं, मॉड्यूलर किचन था, जर्मन कार थी, जर्मन शेफर्ड था।

बस एक जगह नहीं थी।

जहाँ दोनों के बीच बहता हुआ, फक्कड़-सा प्रेम हो।


© मनीष के.


13.12.25

वह क्या था जो चाहिए था?


वह क्या था जो चाहिए था—

और वह क्या है जो हमेशा के लिए खो गया?

और वह क्या है
जो हम सच में पाना चाहते हैं?



perfect-fit लिबास जो instagram-able हो,
या हमारे भरे-बिखरे कमरे में
से कोई एक चीज़,
जो शायद हम ढूँढ नहीं पा रहे हैं!



भीड़ में खड़े होकर भी
या अकेले कमरे में बैठकर भी,
लगातार स्क्रोल मशीन बने
हम मोबाइल में क्या खोज रहे हैं?

उँगलियाँ ऊपर-नीचे करती रहती हैं,
मानो किसी दिन
स्क्रीन के आख़िरी सिरे पर
कोई उत्तर मिल जाएगा।



क्या वह महँगा सोफ़ा, घड़ी या फ़ोन
जो कार्ट में added है,
क्या वह हमारा खालीपन भर देगा?

जो नहीं मिला, वही सबसे ज़्यादा चाहिए,
और वही हम सबको चाहिए।

एकदम same imagination है,
या जबरन करी जा रही है।



कोई कल्पना, कोई प्रेम,
या फिर वही जीवन
जो हमेशा किसी और के पास
अधिक सुंदर लगता है।



सिग्मंड फ़्रॉयड ने कहा था—
मनुष्य का वर्तमान
उसके बचपन का विस्तार होता है।

love, fear, attraction, jealousy—
सब कुछ वहीं आकार लेता है,
जहाँ पहली बार
हमने स्वयं को असुरक्षित पाया था।



तो सवाल यह नहीं कि
बचपन कैसा था।

बल्कि यह है कि
क्या हम जीवन भर
उसी डर को छुपाने के लिए
जीते रहते हैं?

जैसे—
सबसे पहली बार
झूठ कब बोला?


प्रेम : 

प्रेम शायद इसलिए इतना तीव्र होता है,
क्योंकि वह उस पुराने अकेलेपन पर
पट्टी बाँधने की कोशिश करता है।

और जब प्रेम टूटता है,
तो वह केवल एक संबंध नहीं तोड़ता—
वह बचपन की सारी असुरक्षाओं को
फिर से जगा देता है।


ऊब : 

कामू ने कहा था—
मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष
जीवन की निरर्थकता से है।

तो क्या आज
हम सब अपने दुःख से कम,
बल्कि अपनी-अपनी ऊब से
ज़्यादा डर रहे हैं?



एक पल के लिए,
जब यही ऊब
और वही पिछला डर
हमें घेरता है,
तो मन करता है—

जलती आग में
एक खेल हो जाए,
फिर धरती में
ज़िंदा दफ़न हो जाए,

या कहीं—
कैसे भी—
नदी से लेकर
चलती ट्रेन के दरवाज़े तक,
या सबसे ऊपरी छतों तक।



तो क्या यह
बस ख़ुद से भाग जाना है?

तो क्या हम
ख़ुद से ज़्यादा निराश हैं?
हमने ख़ुद पर ज़्यादा ज़ुल्म किए हैं,
या किसी और ने?



नीत्शे ने चेतावनी दी—
जब समाज
केवल सुविधा
और नैतिकता के नाटक पर जिएगा,
तो मनुष्य
भीतर से खाली हो जाएगा।

अब हर तरफ़ डर है।
विश्वास एक जोखिम बन चुका है।
ईमानदारी—एक कमजोरी।

और प्रेम—
कोई गूलर का फूल,
जो होता होगा,
पर दिखता नहीं।



और फिर उसने कहा—
“मैं शादी को
प्रेम से बाँधती नहीं हूँ।”

और फिर
प्रेम में टूटे लोगों को
न मुक्ति है—
न मौत
(कोई भ्रम न पाले)।



कोई मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा नहीं,
न कोई पंडित, न मुल्ला।

धीरे-धीरे
आँखों की सारी बीनाई
ख़त्म हो जाएगी।

और कागा ने अरज मान के
अगर आँख छोड़ भी दी,
तो वह
न आएगा
जो आने वाला था।


धोखा: 

हम सब
किसी न किसी को
धोखा दे रहे हैं—
और शायद
सबसे पहले
अपने आप को?

नहीं तो
जिन सिद्धांतों के लिए
हम लड़ने को तैयार थे,
वे आज
ऐसे क्यों
रफ़ा-दफ़ा किए जा रहे हैं?


झूठी सहमतियाँ और सभ्यता का ढोंग

हम हँसते हैं,
पर हँसी झूठी है।

हम सहमत होते हैं,
पर सहमति में
आत्मा नहीं होती।

औपचारिक सहमतियाँ—
“हाँ-हाँ सर”,
“कोई दिक्कत नहीं।”

और फिर वही आदत—
जब तुमने खाया नहीं होता
और झूठ बोलते फिरते हो
कि तुम खा चुके हो।

यह इस सभ्यता का ढोंग है—
जबकि तुम
दर्द से चीखकर
असलियत कह देना चाहते हो।


दो दिशाएँ:

एक दूर चमकता तारा—
जिसे “वह” देख रही है,
जो उम्मीदों से
थक चुकी है।

तारे
आँसू पोंछने
कब आते हैं?

दूसरी ओर कोई,
जो दूर जाती सड़क को देखता है।

वह किसी बड़े, घने जंगल में—
जो पहाड़ों के एकदम पास हो—
गायब हो जाना चाहता है।

दोनों के तरीके
अलग-अलग हैं,
और पीड़ा—
एक।

या यूँ कह लो,
सबके अपने-अपने तरीके हैं!



उपनिषद कहते हैं—
“कामना से ही
दुःख उत्पन्न होता है।”

बुद्ध ने कहा—
तृष्णा ही
समस्त क्लेशों की
जड़ है।

पर हम
न इच्छा छोड़ सकते हैं,
न उसके बिना
जी सकते हैं।


अमरबेल:

हम सब
धीरे-धीरे
इन्हीं भ्रमों में
लिपटते जा रहे हैं—

जहाँ सफलता,
प्रेम,
पहचान,
प्रतिष्ठा—
सब खोखली होगी।

और यही खोखलापन
हम सबको
एक दिन ढक देगा,
जैसे कोई अमरबेल
अपने आप फैल रही हो,

या फिर
किसी वीरान होती
विरासत पर
उगी घास।


© मनीष के.


10.12.25

वह एक दिन

वह एक दिन

जब मन करे अपने नाखूनों से

अपना ही चेहरा नोच लेने का।

जब मन करे किसी से

या अपनी ही ज़िंदगी से बेवफ़ा हो जाने का।

वह एक दिन

जो बीत ही नहीं रहा हो।


वह एक दिन

जब समुंदर में डूब जाने का मन हो।

वह एक दिन

जब आग से खेल जाने का मन हो।


वह एक दिन

जिसमें सदियाँ घटने लगती हैं।

जिस दिन छूट गई हो नौकरी,

या कोई ज़रूरी परीक्षा।

वह एक दिन

जिस दिन कोई अपना छोड़ जाए।


वह एक दिन

जब मासिक धर्म से दुखती कमर को

पूरे दिन धूप में जलना हो।

वह एक दिन

जिस दिन लगने लगे

कि जिया जाए तो किसके लिए।


वह एक दिन

जब रोने से भी दिल हल्का न हो।

वह एक दिन

जब पैसों की किल्लत

ज़िंदगी की जिल्लत से भी बदतर लगे।


वह एक दिन

जब पानी भी भूख न मिटा पाए।


वह एक दिन

जो तमाम कोशिशों के बावजूद

न बीत रहा हो।

वह एक दिन

जो किसी के लिए

एक साल, दो साल

या दस साल का हो सकता है।


वह एक दिन

जिसमें साँसें घुट रही हों।

बस इंतज़ार करना

घुटती साँसों

और बंद होते दिल के साथ

उस दिन के बीत जाने का।


© मनीष के.


4.12.25

गिलास

 वे अलग-अलग शक्ल और कद-काठी के होते हैं —
कभी उनकी पेंदी में हल्की-सी नेल पॉलिश का टीका,
जैसे किसी ने उन पर नज़र उतारी हो।
कभी शीशे के — दिल जैसे,
एकदम पारदर्शी और शुद्ध काँच के।

और कभी-कभी, कहीं-कहीं,
बेपैरहन — फाइबर की शक्ल में।

पड़े रहते हैं हमारे घर के उस हिस्से में,
जो लगभग अछूता होता है।

जब खान चा या उस टोले का कोई आ जाए,
तो बस, इनकी बल्ले-बल्ले।
तुरंत पूछा जाता है —
“अरे, वो वाला गिलास निकालो।”

झट नहला-धुला कर,
रेडिमेड  होके
सामने आ खड़े होते हैं —
और जाते ही, फिर अपनी पुरानी जगह पर।

कभी दो टोलों की दूरी घटा देते हैं,
कभी और बढ़ा देते हैं।

वे खुद नहीं जानते —
किसने उन्हें ‘छूने लायक’ बनाया,
और किसे उनसे दूर रहना सिखाया।

पर हमने उन्हें
पीढ़ी दर पीढ़ी संभाले रखा है —
और न जाने कितनी पीढ़ियों तक
ऐसे ही संभाले रखेंगे।

सनद रहे —
यह कोई जातिवादी कविता नहीं है।
© मनीष के.

3.12.25

नैरेटिव चेंज

लुटियन्स में बैठे हमारे प्रधान सेवक को
फ़िक्र है देश में बढ़ती 'ओबेसिटी' की।
वहीं, खान मार्केट से लेकर
पूरी दिल्ली में फैले बड़े-बड़े कवियों को
फ़िक्र है — ग़ज़ा की।

विदर्भ के किसान,
भुखमरी में मरे सुदूर इलाक़ों के लोग,
या ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हमारी रैंक —
सब महज़ एक विदेशी प्रोपेगेंडा हैं,
ऐसा बताया गया है।

आप इन सब में
कोई क्रोनोलॉजी मत खोजिए।

देश के मीडियाई कबूतरों — यह सरकार की आलोचना नहीं है
और सनद रहे,
यह कोई कविता भी नहीं है।

© मनीष के.