गार्ड ने इंटरकॉम पर पूछा, “मैम, डिलीवरी है। भेज दूँ?”
संध्या ने मोबाइल पर आए नोटिफिकेशन को देखा और अप्रूव कर दिया। फिर उसी मोबाइल पर अपनी इंस्टा स्टोरी देखने लगी। स्टोरी में उसके घर के दरवाज़े की तस्वीर थी, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था, “Home Sweet Home.”
वह दिल्ली की एक चमचमाती, पॉश सोसाइटी का 3BHK प्लस फ्लैट था। कीमत करोड़ों में। लग्जरी ऐसी कि गार्ड आपके आने से पहले अप्रूवल भेजते थे, कैमरे आपको तब तक देखते रहते थे, जब तक आप उस फ्लैट तक न पहुँच जाएँ जहाँ आपको जाना है। डिलीवरी वालों के लिए अलग लिफ्ट थी, सर्विस वालों के लिए अलग, और फ्लैट में रहने वालों के लिए अलग।
यह फ्लैट संध्या के पापा ने अच्छी-खासी बेस पेमेंट करके खरीदा था। तय हुआ था कि शादी के बाद EMI दोनों बच्चे मिलकर भर लेंगे। अभी भी हर महीने लाख के करीब EMI जाती थी।
सूरज छत्तीसगढ़ से था और संध्या लखनऊ से। दोनों पढ़ने-लिखने में शुरू से ब्रिलियंट माइंड टाइप रहे थे। सूरज वह लड़का था जिसके मैथ्स में सौ में सौ आते थे। संध्या वह लड़की थी जो मैथ्स भी कर लेती थी और मौका मिले तो मंच पर थिरक भी लेती थी।
कॉलेज में वह कल्चरल प्रोग्राम्स में भाग लेती थी। कभी-कभी लिखती थी। आर्ट बनाती थी। किताबें पढ़ती थी। अब भी किताबें पढ़ना चाहती थी, लेकिन जिस कंपनी में वह टीम लीड थी, वहाँ कभी-कभी वीकेंड भी कंपनी का हो जाता था।
सूरज सिर्फ पढ़ीस टाइप का स्टूडेंट था। सीधा, तेज, मेहनती और लक्ष्य पर टिके रहने वाला। उसने कभी गाने नहीं गाए, कभी बेवजह कविताएँ नहीं पढ़ीं, कभी किसी बात को जरूरत से ज्यादा महसूस नहीं किया। वह उन लोगों में से था जो जीवन को ठीक-ठीक जीते हैं, ज्यादा बहते नहीं।
पढ़ाई खत्म होते ही दोनों को दिल्ली-एनसीआर में नौकरी मिल गई। लाखों के पैकेज वाली। दोनों मध्यवर्गीय परिवारों से थे, लेकिन थोड़ा अलग तरह के मध्यवर्ग से। सूरज के माता-पिता सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उसे कभी बहुत अधिक आर्थिक तंगी का अहसास नहीं हुआ। संध्या के पिताजी प्रदेश की राजनीति में थे, रुतबे वाले आदमी। जब दोनों ने IIT फोड़ा, तो दोनों परिवारों ने अपने-अपने मोहल्लों में महीनों तक सीना तानकर चलना जारी रखा।
खैर, मध्यवर्गीय परिवारों में आदमी के जीवन के कुल चार ही चरण माने जाते हैं: जन्म, इंजीनियरिंग या डॉक्टरी, शादी-बच्चे और मौत। इसके इतर सब बकवास है। UPSC हो जाए तो बात अलग है।
संध्या के घरवालों ने उसके लिए रिश्ता खोजना शुरू किया। उसने कई रिश्तों को मना किया, तो एक दिन घरवालों ने वही पुराना जाल फेंका, “कोई हो तो बता दो?”
कोई था नहीं। मतलब, संध्या कभी किसी प्रॉपर रिलेशनशिप में नहीं रही थी। लेकिन एक लड़का था, संयम। किसी दोस्त का दोस्त। ठीक-ठाक नौकरी। आर्ट और सिंगिंग का शौकीन। वह बेसुरा नहीं था, पर बहुत अच्छा गायक भी नहीं था। बस जब गाता था तो लगता था कि गाना किसी सुर से ज्यादा किसी भरोसे पर टिका है।
संयम को संध्या पसंद थी। संध्या की लखनवी तहजीब, उसका लहजा, उसकी बेवजह लंबी बातें। संध्या भी उसे पसंद करती थी। वह उससे मिलती तो ऑफिस, घर, किताब, सड़क, मौसम, ऑटो वाले की बदतमीज़ी, किसी पुरानी कविता, किसी नए कैफ़े, सब पर बोलती चली जाती। संयम सुनता रहता। बीच-बीच में बस इतना कहता, “तुम बोलती नहीं हो, बहती हो।”
संध्या हँस देती।
एक दिन संध्या ने उससे कहा, “अपना बायोडाटा दो। दीदी को भेजती हूँ। वह पापा से बात करके ट्राई करेंगी।”
संयम ने बायोडाटा भेज दिया। उसमें डिग्री थी, नौकरी थी, सैलरी थी, शौक थे। बस खानदान उतना भारी नहीं था, जितना संध्या के घरवालों को चाहिए था।
बायोडाटा संध्या के पापा तक पहुँचा। उन्होंने देखा और कहा, “मास्टरों के घर के मिडिल क्लास लड़के के साथ तुम सर्वाइव नहीं कर पाओगी। और यह बात यहीं खत्म कर दो।”
संध्या ने बहुत बहस नहीं की। शायद वह थक गई थी। शायद वह उन लड़कियों में से थी, जो पिता की बातें ज्यादा काटती नहीं हैं। शायद उसने सोचा होगा कि घरवालों को ज्यादा पता होगा। शायद उसने यह भी सोचा होगा कि पसंद और जीवन दो अलग चीज़ें हैं।
जब संयम को यह बात पता चली, तो उसका प्रयास भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। वह ज्यादा पैसे कमाने का वादा कर सकता था। मेहनत करने का वादा कर सकता था। संध्या को खुश रखने का भी वादा कर सकता था। पर अपना खानदान रातोंरात नहीं बदल सकता था।
फिर सूरज का रिश्ता आया। किसी कॉमन रिश्तेदार के यहाँ से। लड़का IIT वाला। नौकरी अच्छी। परिवार ठीक। आदतें साफ। भविष्य सुरक्षित। संध्या के पापा को रिश्ता पसंद आया।
कोर्टशिप पीरियड में संध्या और सूरज मिले भी। कैफ़े में। मॉल में। कभी-कभी फोन पर। बातें हुईं, नौकरी, शहर, घर, लोन, फर्नीचर, शादी की डेट, गेस्ट लिस्ट, हनीमून पैकेज। सब जरूरी बातें। कोई फिजूल बात नहीं।
शादी हो गई।
कई साल हो गए उन्हें उस महंगी सोसाइटी में रहते हुए। घर में सब कुछ था। जर्मन कार से लेकर जर्मन शेफर्ड तक। मॉड्यूलर किचन था। दो बालकनियाँ थीं। एक स्टडी थी। दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स थीं। दरवाज़े पर “Home Sweet Home” लिखा था। इंस्टा बायो में “Happily Married Ever After” भी।
सूरज जिम्मेदार पति था। बिल समय पर भरता था। EMI कभी लेट नहीं होती थी। संध्या बीमार पड़ती तो डॉक्टर की अपॉइंटमेंट बुक कर देता। उसकी फ्लाइट हो तो कैब लगा देता। घर में कुछ खराब हो जाए तो सर्विस रिक्वेस्ट डाल देता। वह सब करता था जो एक पति को करना चाहिए।
बस वह नहीं करता था जो प्रेम कभी-कभी बिना किसी चेकलिस्ट के कर देता है।
दुख के भयंकर पलों में वे एक-दूसरे को गले नहीं लगाते थे। सुख के अथाह क्षणों में भी एक-दूसरे को बेतहाशा चूमते नहीं थे। सूरज ने टूटी हुई आवाज़ में संध्या को कभी कोई गाना नहीं सुनाया। संध्या भी यूँ ही, बिना बात, उसके सामने कभी नहीं थिरकी।
कभी-कभी उसे संयम याद आता था। कोई बड़ा प्रेम नहीं। कोई महान प्रेमकथा नहीं। बस वह लड़का, जिसके सामने वह ढेर सारी फिजूल बातें कर सकती थी। जिसके साथ चलते हुए उसे लगता था कि वह चल नहीं रही, थिरक रही है।
एक रविवार संध्या ने अलमारी साफ करते हुए पुरानी डायरी निकाली। उसमें एक पन्ने पर उसने कभी लिखा था, “कुछ लोग जीवन में घर नहीं देते, पर भीतर जगह बना देते हैं। जहाँ बहुत कुछ न होते हुए भी लगता है कि सब कुछ है।”
वह देर तक उस लाइन को देखती रही।
सूरज ने कमरे में आते हुए पूछा, “लंच में क्या ऑर्डर करें?”
संध्या ने कहा, “कुछ भी।”
“थाई?”
“ठीक है।”
सूरज ने ऐप खोल लिया। संध्या ने खिड़की से बाहर देखा। नीचे डिलीवरी बॉय अपनी अलग लिफ्ट की तरफ जा रहा था। सर्विस स्टाफ अपनी अलग लिफ्ट की तरफ। रेज़िडेंट्स अपनी अलग लिफ्ट से ऊपर जा रहे थे।
उसे अचानक लगा कि इस घर में भावनाओं की भी अलग-अलग लिफ्टें हैं।
दुख अपनी लिफ्ट से आता है। सुविधा अपनी लिफ्ट से। जिम्मेदारी अपनी लिफ्ट से। और प्रेम शायद नीचे गेट पर ही खड़ा रह जाता है, अप्रूवल का इंतज़ार करता हुआ।
उसने मोबाइल उठाया। इंस्टा पर अपनी ही पुरानी स्टोरी खुली थी, “Home Sweet Home.”
संध्या ने स्क्रीन बंद कर दी।
घर में तीन बेडरूम थे, एक स्टडी थी, दो बालकनियाँ थीं, मॉड्यूलर किचन था, जर्मन कार थी, जर्मन शेफर्ड था।
बस एक जगह नहीं थी।
जहाँ दोनों के बीच बहता हुआ, फक्कड़-सा प्रेम हो।
© मनीष के.
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